WAHABI ZAROORAT NAHI TERI ISLAM KE MAIDANO ME
वहाबी ज़रूरत नही तेरी इस्लाम के मैदानों में,
तू गुस्ताख़ है बसेरा कर इब्लीस के मकानों में !
क्या मिलता है तुझे आखिर कुफ्र के यारानो में,
तौबा कर आ बैठ मुस्तफा के दीवानों में !
नुक्स ढूंढते हो मेरे मेरे मुस्तफा की शानो में,
क्यों करे हम शुमार तेरा मुसलमानो में !
तेरा चेहरा क्यों न दिखाऊ तुझे मुस्तफा के फरमानों में,
बताने लगा हूँ तेल डाल लें अपने कानों में !
फरमाया मुस्तफा ने ज़ाहिर होंगा एक गरौह,
होंगा शुमार जिनका अहमक़ नवजवानों में !
भेड़िये होंगे भेड़ की खाल में,
मिठास ही होंगी ज़बानों में !
लगाएंगे फतवे शिर्क के तुझ पे,
पाई जाएंगी ये निशानी नादानों में !
करेंगे क़त्ल मुसलमानो को मगर,
झुकायेंगे सर अपने वो बुतखानो में !
उड़ा दो सर उनका देखो जिधर,
लानत है उनपर दोनो जहानों में !
तेरे सिवा कौन है आखिर वो गरौह,
जिस की खबर है मुस्तफा के फरमानों में !
ज़रा झांक गरेबान में तेरे सिवा इस जहान में,
कौन बेचता है शिर्क के फतवे अपनी दुकानों में !
मज़ार को कहे मंदिर लानत है तुझ पर,
तुझे क्यों आता है नज़र शिर्क इन आस्तानो में !
कर देंगे हम हर गुस्ताख का सर क़लम,
बस रह जाएंगा नाम तुम्हारा अफ़सानो में !
वाह क्या खूब लिखी है इमरान ने नज़म,
है बरपा मातम बातिल के अएवानो में
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