आला हज़रत के इश्किया कलाम

🌹आला हजरत के इश्किया कलाम🌹

🍂फशॅ वाले तेरी शौकत का उलू क्या जाने 
खुस्रवा अशॅ पे उडता है फरेरा तेरा

🍂तेरी मरजी पा गया सूरज फिरा उल्टे कदम
तेरी उंगली उठ गई मह का कलेजा चिर गया

🍂तेरी आमद थी के बैतुल्लाह मुजरे को जुका
तेरी हैबत थी के हर बुत थर थरा कर गीर गया 

🍂मालिके कौनेन हे गो पास कुछ रखते नही 
दो जहां कि नेअमते है इन के खाली हाथ मे

🍂किस के जल्वे की जलक है ये उजाला क्या है
हर तरफ दीद ए हैरत जदा तकता क्या है 

🍂अशॅ पे ताजा छेडछाड फशॅ में तुरफा धुमधाम
   कान जिधर लगाइये तेरी ही दास्तान है

🍂वोह जो न थे तो कुछ न था वो जो न हो तो कुछ न हो 
जान हे वो जहान की जान है तो जहान है

🍂शफाअत करे हश्र मे जो रजा की 
सीवा तेरे किस को ये कुदरत मीली है 

🍂जिक्र उन का छेडीये हर बात मे 
छेडना शैतां का अपनी आदत कीजिए 

🍂काबा है बेशक अन्जुम आरा दुल्हन मगर
सारी बहार दुल्हनो मे दूल्हा के घर की है 

🍂आबाद एक दर है तेरा ओर तेरे सीवा
जो बारगाह देखीये गैरत खन्डर की है

🍂ताज वाले देखकर तेरा इमामा नुर का
सर जुकाते हे इलाही बोलबाला नुर का

🍂तु है साया नुर का हर उज्व टुकडा नुर का
साए का साया न होता है न साया नुर का

🍂तुम से खुला बाबे जूद तुम से है सब का वुजूद 
तुम से है सब की बका तुम पे करोडो दुरूद

🍂इसालते कुल इमामते कुल सियादते कुल इमारते कुल
 हुकुमते कुल विलायते कुल खुदा के यहां तुम्हारे लिए 

🍂जो न भुला हम गरीबों को रजा
यखद उसकी अपनी आदत कीजीये

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